Breaking News

6/recent/ticker-posts

समान नागरी संहिता को आदिवासियों पर लागू न कर संवैधानिक संकट खड़ी न करने हेतु निवेदन

सेवा में, माननीय सदस्य सचिव, राष्ट्रीय विधि आयोग नयी दिल्ली, भारत विषय:- आदिवासियों, अनुसूचित जनजातियों के रीति रिवाज परंपरा, अलग विवाह, उत्तराधिकार कानून तथा इसी की वजह से प्राप्त संविधान के अनुच्छेद 13 3 क के अनुपालन, संविधान बनाने वालों के द्वारा संवैधानिक विधि, सारवान प्रश्न निहित, (integral sceme), संविधान पूर्व करार, संधि [ अनुच्छेद 13 3 क, 372(1)] का ध्यान रखते हुए संविधान के अनुच्छेद 44 में लिखित राज्य के नीति निर्देशक तत्व के अनुसार समान नागरिक संहिता का देश भर के अनुसूचित क्षेत्र, अनुसूचित जनजाति, विस्थापित अनुसूचित जनजाति और प्रवासित( migrated ) आदिवासियों पर लागू न कर संवैधानिक संकट खड़ी न करने हेतु निवेदन महाशय, सविनय निवेदन है कि संविधान के लागू होने 26 जनवरी 1950 के साथ ही अनुच्छेद 1 में 4 राज्यक्षेत्र विभाजन क्रमशः Part a state order, Part B state order, Part C state order, Part D state order के रूप में सामान्य राज्य तथा Scheduled area part A State order 1950 के रूप में ब्रिटिश इंडिया तथा ट्राइबल एरिया के अंतर्गत, तथा Scheduled area part B stated order के रूप में राजस्थान सहित अन्य राज्यों के स्वतंत्र आदिवासी क्षेत्रों को पांचवी अनुसूचित क्षेत्र/ आदिवासी क्षेत्र निर्धारण किया गया। [According to Indian independence act section 7a,b,c and government of India act section 311] देश भर के लगभग 500+ से अधिक आदिवासी समुदाय को अनुसूचित जनजातियों के रूप में संविधान अनुसूचित जनजाति आदेश 1950 के तहत तथा अनुच्छेद 342 , 366(25) के तहत अधिसूचित किया गया, जिसको अधिसूचित करने की शक्ति राष्ट्रपति महोदय को है जिसको लोकुर कमेटी के माध्यम से पांच विशेषताओं की गणना से अनुसूचित जनजाति निर्धारण करने का अधिकार बना दिया गया जिसका काफी दुरुपयोग किया गया है। लोकुर कमेटी के माध्यम से अनुसूचित जनजाति होने के पांच विशेषताओं में एक विशेषता अनूठी बोली भाषा संस्कृति आदिम जनजाति गुण भी है। संविधान के अनुच्छेद 244 (1) के प्रावधान पांचवी अनुसूची प्रावधान के अनुसार कोई भी कानून अधिसूचित अनुसूचित जनजातियों के रीति रिवाज परंपरा, शादी विवाह, उत्तराधिकार तथा गांव की स्थापना पर हस्तक्षेप नहीं करेगा। सुप्रीम कोर्ट के समता बनाम आंध्र प्रदेश 1997 जजमेंट अनुसार Object of 5th Schedule is to preserve tribal autonomy.. महाशय 22वें लाॅ कमीशन ने एक समान नागरिक संहिता /यूनिफॉर्म सिविल कोड कोड लागू करने या ना लागू करने हेतु आपत्ति या सहमति मांगे थे, जिस पर हम देशभर के आदिवासी समुदाय को शक के साथ में डर भी है कि अन्य धर्म /जाति के पर्सनल लॉ की सिविल कोड की समानता के साथ ही हम देशभर के आदिवासी/अनुसूचित जनजातियों की कस्टमरी लॉ यानी हिंदू, मुस्लिम, ईसाई पर्सनल लॉ से विपरीत शादी उत्तराधिकार आदि के अलग कानून रीति रिवाज परंपरा के अनुसार कस्टमरी लॉ को समाप्त कर एक समान नागरिक संहिता हम पर भी लागू किया जाएगा। चुंकि संविधान में अनुसूचित जनजाति का स्टेटस हम आदिवासियों के अलग रीति रिवाज, परंपरा, शादी विवाह ,जन्म मृत्यु संस्कार ,उत्तराधिकार तथा गांव की अलग व्यवस्था के तहत प्राप्त है, जिसको संविधान के अनुच्छेद 13(3) क भी मान्यता देती है।( सुप्रीम कोर्ट का मधु किश्वर बनाम बिहार राज्य 1996) । एक समान नागरिक संहिता /यूनिफॉर्म सिविल कोड हम देशभर के अनुसूचित जनजातियों पर लागू होने के साथ ही संविधान में अधिसूचित हमारी अनुसूचित जनजाति यानी कि ST का स्टेटस समाप्त हो जाएगा और चुंकि जल, जंगल, जमीन खनिज आदि पर आए सुप्रीम कोर्ट के कई तरह के जजमेंट ( समता बनाम आंध्र प्रदेश 1997, पी रम्मी रेड्डी जजमेंट 1988 आदि ) , देशभर में लागू जमीन के कानून टेनेंसी एक्ट और लैंड रिवेन्यू कोड में एसटी STऔर एससी SC के जमीन के विशेषाधिकार यानी एसटी की जमीन एसटी को ही बिकेगी तथा एससी की जमीन एससी को ही बिकेगी यह भी समाप्त हो जाएगा। संविधान के तहत अनुच्छेद 244 (1) के प्रावधान पांचवी अनुसूची में प्राप्त विशेषाधिकार अलग प्रशासन व्यवस्था , जहां पर संविधान के होते हुए भी 5वीं अनुसूची प्रावधान के पैरा दो में अनुसूचित क्षेत्र में कार्यपालक मजिस्ट्रेट का प्रावधान है , जोकि Scheduled District Act 1874, गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1919 सेक्शन 52A,गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1935 सेक्शन 91, 92 के तहत वर्तमान तक चली आ रही है जिसका अनुपालन नहीं किया जा रहा है , कार्यपालक मजिस्ट्रेट की जगह जुडिशल मजिस्ट्रेट अनुसूचित क्षेत्र में असंवैधानिक तरीके से बिठाए जा रहे हैं। ऐसे में महाशय यदि यह मान लिया जाए की दुविधा में पड़े हम आदिवासियों को दिग्भ्रमित किया जाए कि एक समान नागरिक संहिता हिंदू ,मुस्लिम, ईसाई पर्सनल लॉ को मानने वाले लोगों पर ही लागू होगा , ऐसे में संविधान के अनुच्छेद 244 (1) के प्रावधान पांचवी प्रावधान के तहत अनुसूचित क्षेत्र में कार्यपालक मजिस्ट्रेट की जगह जुडिशल मजिस्ट्रेट आपराधिक मामले की सुनवाई करके आदिवासियों को संविधान विरूद्ध जेलों में डाला जा रहा है, ऐसे में यदि यूनिफॉर्म सिविल कोड अन्य जाति और धर्म के ऊपर लागू करने की अधिसूचना जारी होने कि स्थिति में भी यदि अलग से यह ना लिख दिया गया हो की यूनिफॉर्म सिविल कोड देश भर के आदिवासी/अनुसूचित जनजातियों पर लागू नहीं होगा, तो अनुसूचित जनजातियों के एसटी के स्टेटस पर खतरा है ,जल, जंगल ,जमीन ,खनिज पर खतरा है ,पांचवी अनुसूची पर खतरा है, साथ ही साथ संविधान के अनुच्छेद 334 के तहत लोकसभा और विधानसभा में MLA, MP अनुसूचित जनजाति आरक्षण का प्रावधान है , वह भी एसटी के स्टेटस खत्म होने के साथ में ही आरक्षण भी समाप्त हो जाएगा। इसलिए एकसमान नागरिक संहिता यूनिफॉर्म सिविल कोड के अनुसूचित क्षेत्र, अनुसूचित जनजाति, आदिवासी, विस्थापित आदिवासी, प्रवासित आदिवासियों पर लागू न हो, चूंकि लोकतंत्र का हिस्सा होने के कारण संविधान का अनुच्छेद 13(2) हमें शक्ति देता है कि इस कोड का हम लोकतांत्रिक तरीके से विरोध करें। महाशय, इस कानून के लागू होने से संवैधानिक संकट भी उत्पन्न हो सकता है, चूंकि सुप्रीम कोर्ट के समता जजमेंट 1997 के अनुसार पांचवी अनुसूची integral sceme है। माननीय उच्चतम न्यायालय ने केशवानंद भारती जजमेंट 1973 जजमेंट में पांचवी अनुसूची को संविधान के अंदर संविधान कहा है, तथा संविधान के अनुच्छेद 13 का संशोधन करने पर मनाही की थी। संविधान के अनुच्छेद 13 (3) क के तहत आदिवासियों की रूढ़ि परंपरा को विधि का बल है, तथा इसमें सारवान प्रश्न ( substantial question) निहित है । देश की आजादी से पहले ब्रिटिश ने तीन तरह की शासन व्यवस्था चलाई थी, ब्रिटिश इंडिया, इंडियन स्टेट , ट्राइबल एरिया [ Indian independence act section 7,a,b,c, GOI Act section 311] माननीय उच्चतम न्यायालय ने समता बनाम आंध्र प्रदेश 1997 में इसका उल्लेख भी किया है, महाशय संविधान के अनुच्छेद 370,371,372 में लिखित क्षेत्र के अंतर्गत ये स्वतंत्र रजवाड़े, ब्रिटिश इंडिया, आदिवासी क्षेत्र आते हैं, जिनको ही अनुच्छेद 13 3 क में करार , संधि को उपविधि नियम विनियम कहा गया है, जिसके तहत foreign reduction act 1947 या Extra provincial jurisdiction 1947 के करार के तहत इन सभी आदिवासी क्षेत्रों को करार , संधि के तहत भारत के मिलाया गया, कि आदिवासी क्षेत्रों, आदिवासियों , अनुसूचित जनजातियों की रूढ़ि परंपरा, कस्टमरी लाॅ, लागू विधि(existing law) को बिना नुकसान पहुंचाए भारत की कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका लागू करने की शर्त थी। जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने पांडिचेरी पर आए जजमेंट में कहा कि यूं तो भारत ने फ्रेंच सरकार के साथ करार संधि करके कार्यपालिका न्यायपालिका और विधायिका का विस्तार पांडिचेरी में कर के अनुच्छेद 1 में शामिल कर लिया है, पर करार संधि अधूरा रह जाने की वजह से भारत की अधिकारिता पांडिचेरी में नहीं थी। In N Mastan versus chief commissioner Pondicherry (1962) the supreme court accepted the statement of the central government that although the central government exercised full jurisdiction over Pondicherry by reason of the treaty with the French government, it had not become part of India pending ratification of the treaty by the French parliament. The supreme court therefore, refused to exercise jurisdiction , as Pondicherry had not then become an acquired territory within the meaning of article 1 of the constitution. महाशय, अतः आपसे सविनय निवेदन है कि संविधान के अनुच्छेद 44 के तहत राज्य की नीति निर्देशक तत्व की बाध्यता न होने के कारण तथा संविधान पूर्व करार संधि ( substantial question) होने के कारण यूनिफार्म सिविल कोड/ एक समान नागरिक संहिता को समस्त आदिवासी समुदाय पर, आदिवासी क्षेत्रों में लागू न करें, अन्यथा माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा इस संवैधानिक संकट द्वारा संज्ञान लेने पर देश के समस्त आदिवासी क्षेत्रों की विलय पर वाइट पेपर एग्रीमेंट, संविधान सभा में आदिवासियों के प्रतिनिधि, संविधान सभा में आदिवासी क्षेत्रों के लिए लिखित कई वाद विवाद , ब्रिटिश एटली का 3 जून 1947 का प्लान, भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947, अनुच्छेद 370,371,372(1,2) , अनुच्छेद 13 पर प्रश्न खड़ा न हो जाए, संवैधानिक संकट न उत्पन्न हो जाए। महाशय, अतः आपसे सविनय निवेदन है कि संविधान के अनुच्छेद 44 के तहत राज्य की नीति निर्देशक तत्व की बाध्यता न होने के कारण तथा संविधान पूर्व करार संधि ( substantial question) होने के कारण यूनिफार्म सिविल कोड/ एक समान नागरिक संहिता को समस्त आदिवासी समुदाय पर, आदिवासी क्षेत्रों( इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट 1947 सेक्शन 7 a,b,c , GOI act section 311 में लागू न करें। समस्त आदिवासी समुदाय प्रति देय 1. माननीय राष्ट्रपति महोदया, नई दिल्ली, भारत 2. माननीय अध्यक्ष महोदय, राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग, नई दिल्ली भारत 3. माननीय राज्यपाल महोदय 4. माननीय जनजाति मंत्री महोदय, राष्ट्रीय जनजातीय मंत्रालय

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ