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डाॅ.राहुल कामडे को मिली पीएचडी उपाधि – आयुर्वेद और स्वास्थ्य सेवा में ऐतिहासिक योगदान

भारत एक विशाल देश है, जहाँ चिकित्सा और स्वास्थ्य सेवाएँ भले ही शहरी क्षेत्रों में विकसित हो चुकी हैं, लेकिन ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में अब भी स्वास्थ्य सुविधाओं की भारी कमी देखी जाती है। विशेष रूप से आदिवासी महिलाओं और नवप्रसूताओं के स्वास्थ्य को लेकर कई गंभीर समस्याएँ बनी हुई हैं। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने कई उपलब्धियाँ हासिल की हैं, लेकिन इन सुविधाओं का लाभ समाज के हर वर्ग तक समान रूप से नहीं पहुँच पाया है।


डाॅ. राहुलकुमार रामकृष्ण कामडे ऐसे ही एक समर्पित चिकित्सक हैं, जिन्होंने अपना जीवन ग्रामीण महिलाओं के स्वास्थ्य और प्रसूति तंत्र पर शोध कार्य में समर्पित कर दिया। उन्होंने किसान विद्या प्रसारक संस्था संचालित कर्मवीर व्यंकटराव तानाजी रणधीर आयुर्वेद महाविद्यालय और लिलाई हॉस्पिटल, बोराडी में अपनी सेवाएँ देते हुए हजारों नवप्रसूता महिलाओं की मदद की है। हाल ही में उन्होंने आयुर्वेद चिकित्सा के क्षेत्र में पीएचडी उपाधि प्राप्त की, जो न केवल उनके व्यक्तिगत करियर के लिए, बल्कि आदिवासी स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।

उनकी पीएचडी का यह सफर आसान नहीं था। छह वर्षों की कठिन साधना, 1071 नवप्रसूता स्त्रियों पर किए गए शोध कार्य और नि:शुल्क चिकित्सा सेवाओं की बदौलत उन्होंने यह मुकाम हासिल किया। यह उपलब्धि भारत के लिए एक नया कीर्तिमान है, जिससे आयुर्वेद और आधुनिक चिकित्सा के सम्मिश्रण की संभावनाएँ और भी मजबूत हुई हैं।


पीएचडी उपाधि का सम्मान समारोह

डाॅ. राहुल कामडे को यह प्रतिष्ठित पीएचडी उपाधि भारती विद्यापीठ (अभिमत विश्वविद्यालय), पुणे में आयोजित 26वें दीक्षांत समारोह में प्रदान की गई। इस अवसर पर लोकसभा अध्यक्ष श्री ओम बिड़ला मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे।

यह आयोजन 27 फरवरी 2025 को हुआ, जिसमें सैकड़ों विद्यार्थी, शिक्षाविद, शोधकर्ता और गणमान्य व्यक्ति शामिल हुए। डाॅ. राहुल कामडे को यह उपाधि प्रदान करते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति और अतिथियों ने उनके शोध कार्य की सराहना की और इसे आयुर्वेद के क्षेत्र में एक नई क्रांति बताया।

कर्मवीर अण्णासाहेब व्यंकटराव रणधीर की प्रेरणा

डाॅ. राहुल कामडे की इस यात्रा को समझने के लिए हमें अतीत में झांकना होगा। यह सिर्फ एक चिकित्सक की व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह उस मिशन का हिस्सा है, जिसकी नींव स्व. कर्मवीर अण्णासाहेब व्यंकटराव रणधीर ने रखी थी।

कर्मवीर अण्णासाहेब एक महान स्वतंत्रता सेनानी और समाज के मसीहा थे। उन्होंने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा आदिवासी समाज के उत्थान और उनके स्वास्थ्य सुधार के लिए समर्पित किया।

एक समय की बात है, जब प्रसूति के दौरान स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में एक आदिवासी महिला की मृत्यु हो गई। इस घटना ने अण्णासाहेब को झकझोर कर रख दिया। उन्होंने महसूस किया कि जब तक आदिवासी समाज को सही स्वास्थ्य सुविधाएँ नहीं मिलेंगी, तब तक उनका जीवन स्तर बेहतर नहीं हो सकता।

इसके बाद, उन्होंने 1972 में खानदेश का पहला आयुर्वेदिक महाविद्यालय स्थापित किया। यह कार्य आसान नहीं था। कई सरकारी अधिकारियों और व्यवस्थाओं ने इसे रोकने की कोशिश की, लेकिन अण्णासाहेब की दृढ़ इच्छाशक्ति और संकल्प के आगे सभी बाधाएँ बौनी साबित हुईं।

डाॅ. राहुल कामडे उसी मिशन को आगे बढ़ा रहे हैं। उनका कार्य अण्णासाहेब की विरासत को सम्मान देने और आदिवासी समाज को स्वास्थ्य सुविधाएँ प्रदान करने की दिशा में एक और मजबूत कदम है।

डाॅ. राहुल कामडे का शोध कार्य और समाज पर प्रभाव

पीएचडी के दौरान डाॅ. राहुल कामडे ने छह वर्षों तक लगातार रिसर्च किया और इस दौरान उन्होंने 1071 नवप्रसूता स्त्रियों का निःशुल्क उपचार किया। यह शोध कार्य इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत के आदिवासी इलाकों में प्रसूति और मातृ स्वास्थ्य एक बहुत बड़ी समस्या है।



आइए, उनके शोध कार्य के कुछ मुख्य पहलुओं को समझते हैं:

1. आयुर्वेदिक चिकित्सा और मातृ स्वास्थ्य: डाॅ. कामडे ने अपने शोध में यह सिद्ध किया कि आयुर्वेदिक चिकित्सा और औषधियाँ नवप्रसूता स्त्रियों के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में अत्यधिक प्रभावी होती हैं।

2. स्वास्थ्य सेवा की उपलब्धता: इस शोध कार्य के माध्यम से उन्होंने यह भी दिखाया कि स्वास्थ्य सुविधाओं की आसान उपलब्धता से मातृ और शिशु मृत्यु दर को कम किया जा सकता है!

3. स्थानीय जड़ी-बूटियों का उपयोग: डाॅ. कामडे ने आदिवासी क्षेत्र में उपलब्ध स्थानीय जड़ी-बूटियों और पारंपरिक आयुर्वेदिक औषधियों का उपयोग कर प्रभावी चिकित्सा पद्धतियों को विकसित किया।

4. सामुदायिक जागरूकता: उन्होंने न केवल चिकित्सा सेवाएँ दीं, बल्कि आदिवासी महिलाओं और उनके परिवारों को स्वास्थ्य जागरूकता भी दी, जिससे वे गर्भावस्था और प्रसव से जुड़े महत्वपूर्ण पहलुओं को समझ सकें।

उनका यह शोध न केवल भारत, बल्कि विश्व स्तर पर भी मातृ स्वास्थ्य और आयुर्वेद के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण योगदान साबित हो सकता है।

समाज और चिकित्सा क्षेत्र से मिली सराहना

डाॅ. राहुल कामडे की इस अभूतपूर्व उपलब्धि पर उन्हें समाज के विभिन्न क्षेत्रों से सराहना मिली।

बधाई देने वालों में प्रमुख नाम शामिल हैं:

किसान विद्या प्रसारक संस्था के अध्यक्ष डाॅ. तुषार रंधे

सचिव निशांत रंधे

खजिनदार आशाताई रंधे

पंतप्रधान आत्मनिर्भर अभियान संघटना के जिला अध्यक्ष राहुल रंधे

विश्वस्त रोहित रंधे

शामकांत पाटील

धुळे-नंदुरबार ग.स. बैंक के संचालक शशांक रंधे

प्राचार्य डाॅ. राजेश गिरी

महाराष्ट्र आदिवासी डॉक्टर्स एसोसिएशन शिरपुर

इसके अलावा, बोराडी और आस-पास के गाँवों के हजारों नागरिकों ने डाॅ. कामडे को उनके महान कार्य के लिए बधाई दी और उन्हें आदिवासी क्षेत्र के लिए "देवदूत" करार दिया।


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डाॅ. राहुल कामडे की पीएचडी – एक प्रेरणा

डाॅ. राहुल कामडे की यह उपलब्धि एक प्रेरणादायक कहानी है, जो न केवल चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े लोगों के लिए, बल्कि पूरे समाज के लिए एक मिसाल है। उनका कार्य हमें यह सिखाता है कि यदि हमारे इरादे नेक हों और हमारी मेहनत सच्ची हो, तो हम समाज की भलाई के लिए असाधारण कार्य कर सकते हैं।

उनका शोधकार्य आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मार्गदर्शक बनेगा और भारत में आयुर्वेद के महत्व को और अधिक मजबूत करेगा।

डाॅ. राहुल कामडे की पीएचडी उपाधि केवल एक व्यक्तिगत सफलता नहीं है, बल्कि यह समाज और चिकित्सा क्षेत्र के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। उनके शोध ने यह साबित कर दिया कि आयुर्वेद में वह शक्ति है, जो आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के साथ मिलकर समाज की सबसे बड़ी स्वास्थ्य समस्याओं का हल निकाल सकती है।

उनका यह योगदान न केवल आदिवासी समाज, बल्कि पूरे भारत के स्वास्थ्य तंत्र के लिए एक प्रेरणास्रोत रहेगा। हमें उम्मीद है कि आने वाले समय में ऐसे और भी चिकित्सक मिलेंगे, जो समाज की सेवा को अपना पहला उद्देश्य बनाएँगे और स्वास्थ्य सुविधाओं को हर जरूरतमंद तक पहुँचाने का कार्य करेंगे।



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